मुलताई ( पाशा खान ) ताप्ती नाले में कथित अतिक्रमण को लेकर चल रहा कानूनी विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। स्थानीय न्यायालय ने इस मामले में नियुक्त कमिश्नर के साक्ष्य (बयान) दर्ज करने की अनुमति प्रदान कर दी है। न्यायालय का यह फैसला उस समय आया है जब दोनों पक्षों के बीच 'नाले के अस्तित्व' और 'सीमांकन' को लेकर तीखी बहस चल रही है।
मामले का पूरा घटनाक्रम
प्रकरण की शुरुआत में न्यायालय ने नाले के सीमांकन के आदेश दिए थे। सीमांकन के पश्चात वादियों (मकान मालिकों) द्वारा कुछ आपत्तियां पेश की गई थीं, जिन्हें पूर्व में ही निरस्त कर दिया गया था। अब इसी कड़ी में, मकान मालिकों की ओर से कमिश्नर के बयान दर्ज कराने का आवेदन दिया गया था, जिस पर नगर पालिका और शासन ने अपनी आपत्ति जताई थी।
हालांकि, न्यायालय ने सुनवाई के बाद निर्देश दिया है कि स्थगन (Stay) आवेदन पर अंतिम बहस से पहले कमिश्नर के बयान दर्ज किए जाना आवश्यक है।
दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे
पक्ष 1: मकान मालिकों (वादियों) का तर्क
मकान मालिकों की ओर से न्यायालय में यह पक्ष रखने का प्रयास किया जा रहा है कि जिस 'ताप्ती नाले' के नाम पर अतिक्रमण की बात कही जा रही है, उसका अस्तित्व ही काल्पनिक है। उनका मुख्य उद्देश्य कमिश्नर के बयानों के माध्यम से यह साबित करना है कि निर्माण वैध भूमि पर है और नाले की भौगोलिक स्थिति वैसी नहीं है जैसा प्रशासन दावा कर रहा है।
पक्ष 2: नगर पालिका और शासन का तर्क
नगर पालिका की ओर से अधिवक्ता पंकज यादव ने स्पष्ट किया कि मामला अभी विचाराधीन है और न्यायालय ने अब तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर कोई 'स्टे' (स्थगन आदेश) नहीं दिया है।
- देरी का कारण: अधिवक्ता के अनुसार, स्थगन आवेदन लंबित होने के कारण ही शासन और प्रशासन ने अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की है। शासन को भरोसा है कि कमिश्नर के बयान और राजस्व अभिलेखों से वास्तविक स्थिति साफ हो जाएगी।
निष्कर्ष की ओर प्रकरण
ताप्ती नाले के समीप बने इन मकानों का विवाद लंबे समय से मुलताई में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब सारा दारोमदार कमिश्नर के बयानों और कोर्ट में पेश होने वाले अभिलेखों पर टिका है। इन बयानों के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि क्या वास्तव में वह क्षेत्र नाले की भूमि है या वहां रहने वाले निवासियों के दावे सही हैं।
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