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पति की मौत पर भी 'सीमा' का पहरा: न्याय के लिए दर-दर भटक रही विधवा!


महाराष्ट्र-एमपी के बीच 'फुटबॉल' बना एक गरीब परिवार; सर्पदंश से पति की मौत के बाद वैध दस्तावेजों के साथ दफ्तरों में भटक रही दो बच्चों की माँ।

(संवाददाता: पाशा खान, मुलताई/बैतूल)

मुलताई/नागपुर: क्या किसी गरीब की जान की कीमत इसलिए नहीं चुकाई जाएगी क्योंकि वह राज्य की सीमाओं के बीच फंसा है? यह सवाल आज बैतूल जिले की गीता चावके की आंखों में है, जो अपने पति स्व. अजय वामनराव चावके की मौत के बाद न्याय की भीख मांग रही हैं।

दर्द की दास्तां:

घाट-अमरावती (मुलताई, बैतूल) की निवासी गीता के पति अजय चावके 16 अप्रैल 2024 को नागपुर (महाराष्ट्र) के टांडा रोड स्थित खेतों में मजदूरी करने गए थे। काम के दौरान वे सर्पदंश (Snake Bite) का शिकार हो गए और अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। मौत के बाद पीछे रह गईं गीता, जो आज दिहाड़ी मजदूरी कर दो मासूम बच्चों का पेट पाल रही हैं।

प्रशासनिक संवेदनहीनता:

इस मामले में सबसे दुखद पहलू यह है कि अधिकारी पीड़ित महिला को 'न्याय' देने के बजाय 'क्षेत्राधिकार' (Jurisdiction) का पाठ पढ़ा रहे हैं:

  • महाराष्ट्र के अधिकारियों का तर्क: "मृतक का मूल निवास मध्य प्रदेश है, इसलिए मुआवजा वहीं से मिलेगा।"
  • मध्य प्रदेश के अधिकारियों का तर्क: "घटना महाराष्ट्र में हुई है, इसलिए मुआवजा वहीं से मिलना चाहिए।"

सबूत मौजूद, फिर भी इंसाफ शून्य:

गीता चावके के पास पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पुलिस पंचनामा, मृत्यु प्रमाण पत्र और तहसीलदार द्वारा जारी नाहरकत प्रमाण पत्र (NOC) जैसे तमाम जरूरी दस्तावेज हैं। इसके बावजूद, यह फाइल अधिकारियों की मेज पर धूल फांक रही है।

पाशा खान की टिप्पणी:

"एक मजदूर जब काम पर जाता है, तो वह यह नहीं देखता कि वह किस राज्य की सीमा में है। अधिकारियों का यह 'पासिंग द पार्सल' का खेल न केवल शर्मनाक है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का गला घोंटने जैसा है। क्या हमारी व्यवस्था इतनी पंगु हो चुकी है कि दो राज्यों के बीच एक गरीब महिला को न्याय नहीं दिला सकती?"

'ऑल इंडिया ख़बर' के तीखे सवाल:

  • ​क्या राज्य की सीमाएं गरीब के लिए न्याय की बाधा बन गई हैं?
  • ​क्या संबल योजना और आपदा राहत निधि (SDRF) जैसी योजनाएं सिर्फ कागजों के लिए हैं?

प्रशासन को अल्टीमेटम:

'ऑल इंडिया ख़बर' प्रशासन को चेतावनी देती है कि यदि इस परिवार को अविलंब न्याय नहीं मिला, तो यह मुद्दा शासन के उच्च स्तरों तक उठाया जाएगा। हम उस विधवा के साथ हैं, जिसकी उम्मीदें आज सरकारी दफ्तरों में दम तोड़ रही हैं।

- पाशा खान, संपादक, ऑल इंडिया ख़बर

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