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मुलताई महा-पड़ताल: बारूद के ढेर पर तहसील! 500 पन्नों की फाइलों से खुला ICEM कंपनी का 'गुनाहनामा' और भूकंप का खौफनाक सच!

मुलताई (बैतूल) | विशेष खोजी रिपोर्ट: पाशा खान (All India Khabar)

मुलताई: क्या मुलताई की धरती कुदरत के कारण कांप रही है या किसी के मुनाफे की खातिर इसे बारूद से हिलाया जा रहा है? सरकारी फाइलें गवाही दे रही हैं कि यह प्रशासन के दावों से कहीं अधिक गहरा 'खूनी खेल' है।

🚩 अध्याय 1: 2020 का वो 'दफन' आदेश और तहसीलदार की रिपोर्ट

साक्ष्य: OA 35-23-INSPECTION REPORT का पेज नंबर 3।

इस विवाद की जड़ें साल 2020 में हैं। तत्कालीन तहसीलदार मुलताई और MPPCB की टीम ने 13 अक्टूबर 2020 को एक संयुक्त सर्वे किया था। रिपोर्ट में साफ दर्ज है कि कंपनी मानकों का उल्लंघन कर रही थी और इसकी बिजली काटने व सील करने के निर्देश दिए गए थे।

सवाल: रसूख के आगे 6 साल से वो सरकारी आदेश फाइलों में क्यों दबा रहा?

🚩 अध्याय 2: 5 करोड़ का जुर्माना और 10 लाख का 'चंदा'

साक्ष्य: NGT Order 26.09.2023 और SC Order 03.12.2024।

NGT ने कंपनी की लापरवाही पर 5 करोड़ रुपये का हर्जाना लगाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे बदलकर 10 लाख रुपये पर्यावरण राहत कोष में जमा करने को कहा गया। कंपनी ने 5 मार्च 2025 को यह राशि जमा तो कर दी, पर क्या मुलताई की जनता की सुरक्षा की कीमत सिर्फ 10 लाख है?

🚩 अध्याय 3: 200 किलो बारूद—सरकारी रिपोर्ट का खौफनाक कबूलनामा

साक्ष्य: Restoration Plan रिपोर्ट का पेज नंबर 2।

सरकारी दस्तावेज़ों में स्पष्ट लिखा है कि मेटल क्लैडिंग के लिए एक बार में 180 से 200 किलो विस्फोटक पाउडर का उपयोग होता है। प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट (पेज 3) खुद मानती है— "इस ब्लास्टिंग का प्रभाव भूकंप (Earthquake) जैसा होता है और इसके तीव्र झटके 8 किलोमीटर के दायरे में महसूस किए जाते हैं।"

🚩 अध्याय 4: डेटा की 'चोरी'—सिस्मोग्राफ रिपोर्ट गायब!

साक्ष्य: NGT Order दिनांक 28.01.2026 का पॉइंट नंबर 3।

ताज़ा सुनवाई में प्रदूषण बोर्ड ने कोर्ट में कहा कि कंपनी ने आज तक धमाकों की तीव्रता मापने वाली 'सिस्मोग्राफिक टेस्ट रिपोर्ट' बोर्ड को नहीं दी है। बिना किसी वैज्ञानिक डेटा के प्रशासन इसे 'प्राकृतिक भूकंप' बताकर जनता के साथ सबसे बड़ा धोखा कर रहा है।

🚩 अध्याय 5: लाल ज़हरीला पानी और प्रदूषित भविष्य

साक्ष्य: Water Analysis Report Annexure A-4।

रिपोर्ट गवाह है कि फैक्ट्री से खूनी लाल रंग का दूषित पानी (Red Effluent) बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे खेतों में बहाया जा रहा है। कंपनी मुलताई की ज़मीन ही नहीं, यहाँ के पानी और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को भी ज़हरीला बना रही है।

🚩 अध्याय 6: पंचायतों का रुख—रोजगार या मौत का सौदा?

साक्ष्य: Compliance Reports (Panchayat NOCs)

प्रभात पट्टन, सोमगढ़ और नरखेड़ जैसी पंचायतों के कागजों पर हस्ताक्षर तो हैं, लेकिन धरातल पर जनता खौफ में है। सवाल यह है कि क्या चंद नौकरियों के लिए पूरी तहसील की सुरक्षा से समझौता करना जायज है? क्या पंचायतों पर दबाव बनाया गया?

🚩 अध्याय 7: 5 किमी की गहराई—मानव निर्मित भूकंप का प्रमाण

साक्ष्य: NCS (National Center for Seismology) Data।

वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, मुलताई के हालिया झटकों की गहराई मात्र 5 किलोमीटर दर्ज की गई है। प्राकृतिक भूकंप अक्सर 15-20 किमी गहरे होते हैं। सतह के इतने करीब कंपन होना सीधे तौर पर भारी ब्लास्टिंग का वैज्ञानिक प्रमाण है।

🚩 अध्याय 8: बांधों (Dams) पर 'जल-प्रलय' का खतरा

वैज्ञानिक विश्लेषण: 200 किलो बारूद के झटके ज़मीन के अंदर पानी के दबाव (Hydrostatic Pressure) को हिला देते हैं। मुलताई के पास स्थित बांधों की नींव में ये धमाके सूक्ष्म दरारें (Hairline Cracks) पैदा कर रहे हैं। क्या प्रशासन किसी बड़े बांध हादसे या 'जल-प्रलय' का इंतज़ार कर रहा है?

🔥 'All India Khabar' के सुलगते सवाल:

  1. ​प्रशासन तहसीलदार की 2020 की 'सील' वाली रिपोर्ट पर अब तक खामोश क्यों है?
  2. ​200 किलो बारूद फटने की अनुमति आबादी क्षेत्र के पास किसने और क्यों दी?
  3. ​क्या मुलताई के बांधों की सुरक्षा का कोई वैज्ञानिक स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया गया है?

निष्कर्ष:

500 पन्नों की सरकारी फाइलें चीख-चीख कर कह रही हैं कि मुलताई में जो हो रहा है, वो प्राकृतिक नहीं, बल्कि 'मानव निर्मित' है। मुलताई की जनता अब और खामोश नहीं रहेगी।

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